तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
पल भर जीने के लिये हम कितना मरते है ,
और जब मौत हो करीब हम कितना डरते है ,
अगर हम आगे नहीं तो पीछे हमारे कोंन है
lतुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
रुक रुक कर चलती है सांसे
और जिन्दिगी पल भर के लिये रूकती नहीं ,
दौड़ के इस महाकुम्भ में कुदरत का ये कैसा मोंन है l
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
जिसे दुदने के लिये हम ने अपना दिल जला दिया ,
और सारे शहर में आग लगा दिया ,
देखु उस धुएं के पीछे छुपा कोंन है ल
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
मै तो बद्जुबा हूँ सिमरन ,
मै तो बोलूँगा ,
देखता हूँ ये खुदा कबतक मोंन है !
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
मधुकर (मधुर)
post scrap cancel
Friday, November 6, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment