Friday, November 6, 2009

............. ..... सिमरन ...................

तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !

पल भर जीने के लिये हम कितना मरते है ,
और जब मौत हो करीब हम कितना डरते है ,
अगर हम आगे नहीं तो पीछे हमारे कोंन है
lतुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !

रुक रुक कर चलती है सांसे
और जिन्दिगी पल भर के लिये रूकती नहीं ,
दौड़ के इस महाकुम्भ में कुदरत का ये कैसा मोंन है l
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !

जिसे दुदने के लिये हम ने अपना दिल जला दिया ,
और सारे शहर में आग लगा दिया ,
देखु उस धुएं के पीछे छुपा कोंन है ल
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !

मै तो बद्जुबा हूँ सिमरन ,
मै तो बोलूँगा ,
देखता हूँ ये खुदा कबतक मोंन है !
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !

मधुकर (मधुर)

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