वक्त से कोई गिला ना रहे ,
जिन्दगी से कोई सिला ना रहे !
उडो,की ये वक्त है उड़ने का ,
क्या पता कल आकाश का रंग नीला न रहे !
रात भर क्यों जागो क्या पता ,
कल सूरज ही निकला न रहे !
आज रंग मे हो गोरी ,
क्या पता ,कल वो रंगीला ना रहे !
मधुकर(मधु)
Friday, November 6, 2009
.............मेरा दर्द ..............
लोग प्यासे को पानी देते नहीं ,
सागर मे हाँथ डुबो देते है .......!
बहुत कुछ पाने छाह में
अपनाअस्तित्व ही खो देते है ........!
एक हम है " मधुर " दूसरो
की खुशियों के लिए जलते है ,
और देख कर
गम औरों का रो देते है .......!
तिलिश्म देखिये हमारे हाथो का
काँटों से कुरेदते है
अपने ही जिस्म को
और ख़ुशी मिली अगर
कही और बो देते है ...........!
(मधुर )
सागर मे हाँथ डुबो देते है .......!
बहुत कुछ पाने छाह में
अपनाअस्तित्व ही खो देते है ........!
एक हम है " मधुर " दूसरो
की खुशियों के लिए जलते है ,
और देख कर
गम औरों का रो देते है .......!
तिलिश्म देखिये हमारे हाथो का
काँटों से कुरेदते है
अपने ही जिस्म को
और ख़ुशी मिली अगर
कही और बो देते है ...........!
(मधुर )
............. ..... सिमरन ...................
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
पल भर जीने के लिये हम कितना मरते है ,
और जब मौत हो करीब हम कितना डरते है ,
अगर हम आगे नहीं तो पीछे हमारे कोंन है
lतुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
रुक रुक कर चलती है सांसे
और जिन्दिगी पल भर के लिये रूकती नहीं ,
दौड़ के इस महाकुम्भ में कुदरत का ये कैसा मोंन है l
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
जिसे दुदने के लिये हम ने अपना दिल जला दिया ,
और सारे शहर में आग लगा दिया ,
देखु उस धुएं के पीछे छुपा कोंन है ल
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
मै तो बद्जुबा हूँ सिमरन ,
मै तो बोलूँगा ,
देखता हूँ ये खुदा कबतक मोंन है !
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
मधुकर (मधुर)
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पल भर जीने के लिये हम कितना मरते है ,
और जब मौत हो करीब हम कितना डरते है ,
अगर हम आगे नहीं तो पीछे हमारे कोंन है
lतुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
रुक रुक कर चलती है सांसे
और जिन्दिगी पल भर के लिये रूकती नहीं ,
दौड़ के इस महाकुम्भ में कुदरत का ये कैसा मोंन है l
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
जिसे दुदने के लिये हम ने अपना दिल जला दिया ,
और सारे शहर में आग लगा दिया ,
देखु उस धुएं के पीछे छुपा कोंन है ल
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
मै तो बद्जुबा हूँ सिमरन ,
मै तो बोलूँगा ,
देखता हूँ ये खुदा कबतक मोंन है !
तुम ही बताओ सिमरन कुदरत का ये कैसा मोंन है !
मधुकर (मधुर)
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